Thursday, October 8, 2009

कहीं तुम .....
बज रहीं है शहनाईयां सारी धरा पर मधुर मधुर,
कहीं तुम पैरों को पायल पहनाएंतो नही बैठी !

चल रहा है कोई हमदम बन कर इन कठिन राहों पर ,
कहीं तुम अपना साया मेरे पीछे लगाए तो नही बैठी!

चिर कर अन्धकार प्रकाश की बेला चमक उठी है गगन पर,
कहीं तुम गेसुओं में गजरा लगाये तो नही बैठी!

विरह की वेदना को मिल गई है मिलन की गुंजन ,
कहीं तुम कंठ माधुर्य से मुझे बुलाएं तो नही बैठी!

झंझावातों के सागर में उमड़ पड़ी है सुकून की एक लहर ,
कहीं तुम अधरों पे मधुर मुस्कान सजाएं तो नही बैठी!

काली स्याह रात में चाँद भी शरमा के ओझल हो रहा,
कहीं तुम उसे अपना रूप दिखाएं तो नही बैठी!

धुल गयीं है दशों दिशाएं आज इस गोधुली बेला पर ,
कहीं तुम अपने कोमल बदन को नहलाएं तो नही बैठी!

जाने क्यूँ धड़क रहा है ह्रदय आज जोरो से,
कहीं तुम अपना सीना मेरे सीने से लगाएं तो नही बैठी!

इस श्वेत वर्ण-आसमां पर छा रही क्यूँ कालिमा ,
कहीं तुम आखों में काजल लगाएं तो नही बैठी!

त्रिव इच्छा है गर मिलन की तो कर लो वरना यहीं कहूँगा
कहीं तुम इस समाज के भय से अपनी उत्कंठा छुपाएँ तो नही बैठी!
-अभिनव शंकर


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